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हरिशंकर द्विवेदी : पत्रकारिता, संस्कार, सामाजिक मूल्यों और विचारों की एक अप्रतिम विरासत

Public Lokpal
September 17, 2026

हरिशंकर द्विवेदी : पत्रकारिता, संस्कार, सामाजिक मूल्यों और विचारों की एक अप्रतिम विरासत


( वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार हर्ष वर्धन द्विवेदी द्वारा पंडित हरिशंकर द्विवेदी के जन्म दिवस पर विशेष )

हिंदी पत्रकारिता के इतिहास को केवल अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं और प्रकाशित लेखों के माध्यम से नहीं समझा जा सकता। उसके पीछे ऐसे अनेक कर्मठ पत्रकार और लेखक रहे, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी शब्दों की साधना, समाज के प्रति जिम्मेदारी और विचारों की प्रतिबद्धता को समर्पित की। हरिशंकर द्विवेदी जिनकी आज जन्म तिथि है ,इसी परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में स्मरण किए जाते हैं।

हरिशंकर द्विवेदी का व्यक्तित्व केवल एक पत्रकार या लेखक तक सीमित नहीं था। उनके लिए पत्रकारिता जीवन को देखने और समाज को समझने का माध्यम थी। कलम उनके लिए केवल समाचार लिखने का साधन नहीं, बल्कि विचार और संस्कार को समाज तक पहुँचाने का माध्यम थी।

पत्रकारिता एक जिम्मेदारी—

पुरानी पीढ़ी की पत्रकारिता में व्यावसायिकता की अपेक्षा सामाजिक सरोकार और वैचारिक जिम्मेदारी का महत्व अधिक दिखाई देता था। पत्रकार के लिए तथ्य, भाषा और विश्वसनीयता उसकी सबसे बड़ी पूँजी माने जाते थे। हरिशंकर द्विवेदी का पत्रकारिता से जुड़ा जीवन भी इसी सोच की परंपरा से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।

उनकी पत्रकारिता में समाचार से आगे बढ़कर समाज को देखने की दृष्टि थी। यह वह दौर था जब पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में अपनी जिम्मेदारी निभाने का माध्यम मानी जाती थी।

इसीलिए उनके व्यक्तित्व को समझने के लिए उनकी पत्रकारिता के साथ-साथ उनके साहित्यिक और आध्यात्मिक संस्कारों को समझना भी आवश्यक है।

‘कल्याण’ पत्रिका और भारतीय सांस्कृतिक चेतना से पंडितजी का संबंध —-

हरिशंकर द्विवेदी के संदर्भ में ‘कल्याण’ का उल्लेख विशेष महत्व रखता है। ‘कल्याण’ केवल एक धार्मिक पत्रिका नहीं रही, बल्कि भारतीय धर्म, दर्शन, अध्यात्म, संस्कृति और नैतिक जीवन से जुड़े विचारों को सामान्य पाठक तक पहुँचाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनी।

‘कल्याण’ की परंपरा का संबंध हनुमान प्रसाद पोद्दारजी जैसे व्यक्तित्वों से रहा, जिन्होंने भारतीय आध्यात्मिक साहित्य को जनसुलभ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी व्यापक सांस्कृतिक वातावरण ने हिंदी पत्रकारिता और लेखन की एक ऐसी धारा को जन्म दिया जिसमें पत्रकारिता, साहित्य और अध्यात्म एक-दूसरे से अलग नहीं थे।

हरिशंकर द्विवेदी के व्यक्तित्व को इसी सांस्कृतिक पत्रकारिता की परंपरा के रूप में देखना सार्थक और प्रासंगिक है ।

भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक पत्रकारिता की चर्चा जयदयालजी डालमिया और गीता प्रेस की परंपरा के बिना अधूरी रहती है। इस परंपरा का मूल उद्देश्य भारतीय ग्रंथों और आध्यात्मिक विचारों को समाज के व्यापक वर्ग तक पहुँचाना रहा।

हरिशंकर द्विवेदी के जीवन और संस्कारों के संदर्भ में इस परंपरा का प्रभाव उल्लेखनीय माना जा सकता है। उनके लिए धर्म केवल कर्मकांड का विषय नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों, आचरण और समाज के प्रति दायित्व का विषय था।

यही कारण है कि उनके व्यक्तित्व में पत्रकारिता और आध्यात्मिक-सांस्कृतिक चेतना का एक स्वाभाविक मेल दिखाई देता है।

शब्दों से आगे की विरासत देने वाले पत्रकार —-

किसी पत्रकार की सबसे बड़ी विरासत केवल उसके प्रकाशित लेख नहीं होते। उसकी वास्तविक विरासत वह दूर दृष्टि होती है जो वह अगली पीढ़ी को देता है और अपनी लब्ध जानकारी का हस्तांतरण करता है ।

हरिशंकर द्विवेदी की विरासत को इसी दृष्टि से देखा जा सकता है। पत्रकारिता के प्रति गंभीरता, लेखन के प्रति अनुशासन, भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान और सामाजिक जिम्मेदारी—ये ऐसे मूल्य हैं जो किसी भी युग में प्रासंगिक रहते हैं।

आज जब पत्रकारिता तकनीक, डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया के कारण तेजी से बदल रही है, तब पिछली पीढ़ी की पत्रकारिता के मूल्यों को याद करना और भी आवश्यक हो जाता है। माध्यम बदल सकते हैं, लेकिन सत्य, विश्वसनीयता और सामाजिक उत्तरदायित्व की आवश्यकता समाप्त नहीं होती।

एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक की कहानी है इनकी पत्रकारिता —-

हरिशंकर द्विवेदी की कहानी केवल उनके अपने जीवन की कहानी नहीं है। यह उस पत्रकारिता-संस्कृति की कहानी भी है जिसमें परिवार, साहित्य, अध्यात्म और सार्वजनिक जीवन एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।

उनके संस्कारों की छाप अगली पीढ़ी में भी दिखाई देती है। पत्रकारिता और लेखन से जुड़े परिवारों में यह विरासत अक्सर औपचारिक शिक्षा से अधिक अनुभव, बातचीत और जीवन-मूल्यों के माध्यम से आगे बढ़ती है।

इसी अर्थ में हरिशंकर द्विवेदी को याद करना केवल एक व्यक्ति को याद करना नहीं, बल्कि हिंदी पत्रकारिता की उस परंपरा को स्मरण करना है जिसमें कलम को जिम्मेदारी, पत्रकारिता को सेवा और ज्ञान को समाज की संपत्ति माना जाता था।शब्दों के चयन से लेकर खबरों के चयन करना एक पत्रकार की पहचान होती है , जिसे पंडितजी ने सहसा नहीं बल्कि उत्तरोत्तर अपने अधीनस्थ काम करने वालों के ज़रिए हस्तांतरित किया ताकि पत्रकारिता के जड़ों में समाजोपयोगी पत्रकारिता का सिंचन हो सके ।

आज के समय में प्रासंगिकता—

आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में सूचना की अत्यधिक गति, डिजिटल माध्यमों का दबाव और विश्वसनीयता का प्रश्न शामिल है। ऐसे समय में पुरानी पत्रकारिता की बुनियादी मान्यताओं को याद करना उपयोगी है।

हरिशंकर द्विवेदी की स्मृति हमें यही याद दिलाती है कि पत्रकारिता का वास्तविक मूल्य केवल इस बात में नहीं है कि कितनी खबरें प्रकाशित हुईं, बल्कि इस बात में है कि शब्दों ने समाज में कितनी समझ, संवेदना और जागरूकता पैदा की।

उनकी विरासत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह किसी एक समय या माध्यम तक सीमित नहीं है।

हरिशंकर द्विवेदी को याद करना उस पत्रकारिता को याद करना है जिसमें शब्दों के साथ संस्कार थे, समाचार के साथ सरोकार था और लेखन के पीछे समाज के प्रति एक जिम्मेदारी का भाव था।

यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है—और यही वह विरासत है जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना आवश्यक है।

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