BIG NEWS
- सुप्रीम कोर्ट से कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को मिली अग्रिम ज़मानत
- पार्वती घाटी में दो हाइड्रो प्रोजेक्ट्स के लिए केंद्र की हरी झंडी
- मज़दूरों के विरोध प्रदर्शन के कुछ दिनों बाद, मज़दूर दिवस के लिए पूरे नोएडा में सुरक्षा बढ़ाई गई; धारा 163 लागू
- कमर्शियल LPG की कीमत में 19 किग्रा सिलेंडर पर 993 रुपये की बढ़ोतरी
- MP क्रूज़ बोट हादसा: मरने वालों की संख्या बढ़कर सात हुई; बरगी बांध पर तलाशी अभियान जारी
- वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2026 में एक साल में छह पायदान नीचे गिरा भारत, पाकिस्तान पांच पायदान ऊपर
- राजस्थान में दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर चलती कार में लगी आग, पांच लोग जिंदा जले
- रेप पीड़ितों की प्रेग्नेंसी खत्म करने वाले कानून में बदलाव, सुप्रीम कोर्ट ने की केंद्र से मांग
- एग्जिट पोल के मुताबिक असम में हिमंत की बड़ी जीत, केरल में कड़ा मुकाबला, तमिलनाडु में स्टालिन का दबदबा कायम
- दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की वर्चुअल सुनवाई के दौरान चले पोर्न क्लिप
मुख्य न्यायाधीश ने किसे बताया सर्वोच्च, 'संविधान या संसद'?
Public Lokpal
June 26, 2025
मुख्य न्यायाधीश ने किसे बताया सर्वोच्च, 'संविधान या संसद'?
नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बीआर गवई ने एक बार फिर दोहराया है कि संसद नहीं, बल्कि भारत का संविधान सर्वोच्च अधिकार रखता है और लोकतंत्र के सभी तीन स्तंभ इसके ढांचे के अंतर्गत काम करते हैं।
उन्होंने बुधवार को अमरावती में बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित सम्मान समारोह में ये टिप्पणियां कीं।
उन्होंने कहा, "जबकि कई लोग कहते और मानते हैं कि संसद सर्वोच्च है, मेरे हिसाब से भारत का संविधान सर्वोच्च है। लोकतंत्र के सभी तीन स्तंभ संविधान के अंतर्गत काम करते हैं।"
मूल संरचना सिद्धांत पर आधारित सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का जिक्र करते हुए गवई ने कहा कि संसद के पास संविधान में संशोधन करने का अधिकार है, लेकिन वह इसके मूल ढांचे को नहीं बदल सकती।
पिछले महीने भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ लेने वाले न्यायमूर्ति गवई ने बुधवार को पूर्वी महाराष्ट्र के अपने गृहनगर अमरावती में आयोजित सम्मान समारोह के दौरान ये टिप्पणियां कीं।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले पर केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि 1973 में सुप्रीम कोर्ट ने मूल संरचना सिद्धांत की स्थापना की थी।
उन्होंने यह भी कहा कि न्यायाधीशों का संवैधानिक कर्तव्य है कि वे इसे बनाए रखें और सरकार के खिलाफ आदेश पारित करना न्यायिक स्वतंत्रता को परिभाषित नहीं करता है।





