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हिन्दी दिवस पर विशेष - 'हिन्दी अपने ही देश में सिसक रही है'

Public Lokpal
September 14, 2021

हिन्दी दिवस पर विशेष - 'हिन्दी अपने ही देश में सिसक रही है'


(यह आलेख हर्षवर्द्धन द्विवेदी,कलमकार के फेसबुक वॉल से लिया गया है)

हिन्दी दिवस को जिस सोच के साथ सारगर्भित बनाने के लिए संविधान सभा द्वारा १४ सितम्बर १९४९ को घोषित किया गया था, धीरे-धीरे अपना औचित्य खोता जा रहा है। इस हिन्दी को स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता दिलाने के लिए काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, हजारी प्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा, राजेन्द्र सिंह, सेठ गोविन्ददास आदि साहित्यकारों के अलावा कई हिन्दी के मूर्धन्य पत्रकारों जैसे हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' हरिशंकर द्विवेदी, बनारसीदास चतुतर्वेदी, इलाचंद्र जोशी, दिनेश दत्त झा द्वारा जो अजेय एवं अथक परिश्रम किया गया वह कहीं न कहीं नेपथ्य में जाता नज़र आ रहा है।

व्यौहार राजेन्द्र सिंह का १४ सितम्बर १९४९ को ५०वां जन्मदिवस था और हिन्दी के प्रति उनके जुझारूपन को देखकर संविधान सभा द्वारा इस तारीख को हिन्दी दिवस घोषित कर दिया गया।

२६ जनवरी १९५० को भारतीय संविधान लागू होने पर राजभाषा नीति भी लागू हो गयी जिसमें यह स्पष्ट था कि भारत की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी है। इसके पीछे तथ्य यह था कि यह जनमानस की भाषा है और सर्वाधिक बोली जाती है। गाँधीजी भी इसी मत के पक्षधर थे लेकिन देश के अहिन्दी भाषी लोगों ने इसका पुरजोर विरोध किया। तत्पश्चात अंग्रेजी को भी हिन्दी के साथ-साथ राजभाषा का दर्जा देना पड़ा। इस तरह हिन्दी को एक जगह तो मिली लेकिन साथ ही साथ उसका प्रतिद्वंदी भी खड़ा कर दिया गया।

हिन्दी की रक्षा और भविष्य में इसे देश में सर्वोत्तम स्थान देने के उद्देश्य से अंग्रेजी को राजभाषा का दर्जा तो मिला लेकिन संविधान के अनुच्छेद ३४३ (२) के अन्तर्गत यह भी तय किया गया कि संविधान लागू होने के समय से १५ वर्ष की अवधि तक, अर्थात १९६५ तक संघ ने सभी सरकारी कामकाजों के लिए पहले की तरह अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह था कि इन १५ वर्षों में हिन्दी के जानने वाले हिन्दी सीख जाएंगे और हिन्दी भाषा को प्रशासनिक कार्यों के लिए सभी प्रकार से सशक्त और सक्षम बनाया जा सकेगा।

लेकिन ऐसा न हो सका क्योंकि कॉंग्रेस सरकार के मन्त्री टीटी के कृष्णमाचारी जैसे लोग ही हिन्दी को थोपता हुआ समझकर सरकार के इस कदम का विरोध करने लगे और २६ जनवरी १९६५ को यह प्रस्ताव पारित हुआ कि ''हिन्दी का सभी सरकारी कार्यों में उपयोग किया जाएगा, लेकिन अंग्रेजी का भी सह राजभाषा के रूप में उपयोग किया जाएगा''। इसके बाद तो १९६७ में हिन्दी पर अत्याचार ही कर दिया गया। ''भाषा संशोधन विधेयक'' को लाकर अंग्रेजी को अनिवार्य कर दिया गया। यहाँ तक कि विधेयक में धारा ३(१) में हिन्दी की चर्चा तक नहीं की गयी। इसके बाद अंग्रेजी का विरोध शुरू हुआ लेकिन अंग्रेजों की दासता से मुक्त हुए इस भारत में अंग्रेजियत अभी भी हावी थी और हिन्दी दबकर किसी तरह सिसक-सिसक कर साँस लेने को मजबूर हो गयी।