हिमालय में बर्फ़बारी 23 साल के निचले स्तर पर, 2 अरब लोगों पर मंडराया जल संकट

Public Lokpal
April 27, 2026
हिमालय में बर्फ़बारी 23 साल के निचले स्तर पर, 2 अरब लोगों पर मंडराया जल संकट
एशिया का वॉटर टॉवर कहा जाने वाला हिमालय अब ऊपर से सूख रहा है।
एक नई रिपोर्ट में पाया गया है कि अफ़गानिस्तान से म्यांमार तक फैली एक लंबी पर्वत श्रृंखला हिंदू कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र में बर्फ़ की चादर दो दशकों से भी ज़्यादा समय में अपने सबसे निचले स्तर पर पहुँच गई है। इससे एक बड़े जल संकट की आशंका बढ़ गई है, जिसका असर लगभग 2 अरब लोगों के जीवन पर पड़ सकता है।
काठमांडू स्थित एक क्षेत्रीय शोध संस्था, 'इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट' (ICIMOD) द्वारा जारी 'HKH Snow Update 2026' में पाया गया कि नवंबर 2025 से मार्च 2026 के बीच बर्फ़ का जमाव (snow persistence) लंबे समय के औसत से 27.8 प्रतिशत कम रहा।
आसान शब्दों में कहें तो, बर्फ़ का जमाव इस बात का पैमाना है कि बर्फ़ गिरने के बाद ज़मीन पर कितने समय तक टिकी रहती है। वैज्ञानिक इस पैमाने का इस्तेमाल पहाड़ों में सर्दियों की स्थिति पर नज़र रखने के लिए करते हैं।
हिमालय की बर्फ़ इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
मौसमी बर्फ़ सिर्फ़ एक सुंदर नज़ारा भर नहीं है, बल्कि यह पानी का एक ऐसा बैंक है जिससे धीरे-धीरे पानी निकलता रहता है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि हिंदू कुश हिमालय से निकलने वाली 12 प्रमुख नदी घाटियों में हर साल बहने वाले पानी (जिसे 'रनऑफ़' कहा जाता है) का लगभग एक-चौथाई हिस्सा बर्फ़ के पिघलने से ही आता है।
ये नदियाँ खेतों की सिंचाई करती हैं, पनबिजली संयंत्रों को चलाती हैं, और काबुल से लेकर कोलकाता तक के शहरों में लोगों के घरों तक पानी पहुँचाती हैं।
किन नदियों को सबसे ज़्यादा पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा है?
बर्फ़ में आई यह कमी हर जगह एक जैसी नहीं है। मेकांग नदी घाटी में सबसे ज़्यादा गिरावट दर्ज की गई, जहाँ बर्फ़ का स्तर सामान्य से 59.5 प्रतिशत कम रहा; वहीं तिब्बती पठार में 47.4 प्रतिशत की कमी देखी गई।
येलो रिवर (पीली नदी) और आमू दरिया नदी घाटियों में भी बर्फ़ के स्तर में भारी गिरावट दर्ज की गई है। हालाँकि, भारत के लिए एक अच्छी ख़बर भी है।
गंगा नदी घाटी में इस सर्दी में बर्फ़ का जमाव सामान्य से 16.3 प्रतिशत ज़्यादा दर्ज किया गया है, जिससे उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों को पानी की कमी से निपटने में कुछ हद तक राहत मिल सकती है।
क्या यह सिर्फ़ इसी साल की बात है, या यह एक लंबे समय तक चलने वाला रुझान है?
यह लगातार चौथी ऐसी सर्दी है जब बर्फ़ का स्तर सामान्य से कम रहा है। वर्ष 2003 से अब तक, कुल 14 सर्दियों में इसी तरह की कमी दर्ज की जा चुकी है। इस पर्वतमाला के जमे हुए भंडार, यानी ग्लेशियर भी, साल 2000 से पहले की तुलना में दोगुनी तेज़ी से पिघल रहे हैं; जिससे इस पूरे क्षेत्र में लंबी और सूखी गर्मियाँ पड़ने की आशंका बढ़ गई है।
आगे क्या करने की ज़रूरत है?
वैज्ञानिक सरकारों से आग्रह कर रहे हैं कि वे 'अर्ली वार्निंग सिस्टम' (जल्द चेतावनी देने वाली प्रणालियों) को मज़बूत करें, मौसम के हिसाब से ज़्यादा पानी जमा करें, और खेती व बिजली क्षेत्रों के बीच बेहतर तालमेल बिठाएँ।
ऐसी योजना के बिना, गर्मियों में नदियों का जलस्तर और कम हो सकता है, पीने के पानी के स्रोतों पर दबाव और बढ़ सकता है, और ज़मीन से पानी निकालने (ग्राउंडवॉटर पंपिंग) की प्रक्रिया बेतहाशा बढ़ सकती है।

