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कोरोना काल में श्रमिक दिवस और कार्य संसार की चुनौतियाँ

Public Lokpal
May 01, 2021

कोरोना काल में श्रमिक दिवस और कार्य संसार की चुनौतियाँ


-बीना पाण्डेय

कहते हैं जहाँ समस्याएं अपनी हद पार करने लगती हैं, तो समाधान अपना रास्ता वहीं से निकालता है, जैसे दाब जब अपने ऊपर रखी किसी भारी चीज से ज्यादा शक्तिशाली हो जाता है, वह उसे पलट कर सीधा बाहर निकल आता है, ठीक वैसे ही। ऐसा ही कुछ हुआ औद्योगिक क्रांति के गढ़ संयुक्त राज्य अमेरिका में। जहाँ पूजीपतियों की औद्योगिक आकांक्षाओं ने अपने मातहत काम करने वाले मजदूरों को बस मशीन समझा और बेहद ख़राब परिस्थितियों में भी उन्हें काम करते रहने को मजबूर करते रहे। 19 वीं शताब्दी के दौरान, औद्योगिक क्रांति के चरम का नुकसान संयुक्त अमेरिका के हजारों पुरुष, महिलाएं और बच्चे अपनी असामयिक मौत और अपने अंगभंग से पूरी कर रहे थे। ये कामगार 15 से 18 घंटे बिना किसी सुरक्षा सुविधा के लगातार काम करते, लेकिन इनके काम की कमाई का हिस्सा पूंजीपतियों की जेब और उनकी ऊँची महत्वाकांक्षाओं में खर्च हो जाता। हाड़तोड़ मेहनत के बदले कामगारों के हिस्से आती भूख, बीमारी और अकाल मौत। 

इन अमानवीय स्थितियों से लड़ने और पार पाने के प्रयास में, 1884 में फेडरेशन ऑफ ऑर्गेनाइज्ड ट्रेड्स एंड लेबर यूनियन्स यानी  FOTLU (जो बाद में अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर या AFL बना) ने शिकागो में एक सम्मेलन आयोजित किया। FOTLU ने घोषणा की कि 1 मई, 1886 से अब मजदूरों के श्रम अवधि दिन में केवल आठ घंटे होगी।

अगले साल फिर अमेरिका के सबसे बड़े श्रमिक संगठन 'नाइट्स ऑफ लेबर' ने FOTLU की इस घोषणा का समर्थन किया फिर दोनों समूहों ने मजदूरों को अपने हक़ के लिए हड़ताल और प्रदर्शन करने का रास्ता सुझाया।

1 मई, 1886 को, देशभर के 13,000 पेशों से 300,000 से अधिक श्रमिकों (अकेले शिकागो में 40,000) ने अपनी नौकरियां छोड़ दीं। बाद के दिनों में इस काफिले में और मजदूर शामिल हुए और हड़तालियों की संख्या बढ़कर लगभग 100,000 हो गई।

दो दिनों बाद शिकागो पुलिस ने भयंकर कत्लेआम किया और हेमार्केट में भारी जनसंहार हुआ। मजदूर फिर भी अड़े रहे और दुनिया भर खासकर यूरोप के समाजवादी संगठनों से मिले समर्थन के बाद आखिरकार 1891 में अमेरिका को झुकना पड़ा और जहाँ सितम्बर के पहले सोमवार को मजदूर दिवस घोषित किया गया। कनाडा ने भी जल्द ही यही प्रथा अपना ली।

1889 में, समाजवादी और श्रमिक दलों द्वारा बनाई गई संस्था द सेकंड इंटरनेशनल ने घोषणा की कि 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस के रूप में मनाया जाएगा। आखिरकार 1916 में, अमेरिका ने वर्षों के विरोध और विद्रोह के बाद आठ घंटे को श्रम अवधि को अपनी स्वीकार्यता दे दी।

1917 में रूसी क्रांति के बाद सोवियत संघ और शीत युद्ध के दौरान ईस्टर्न ब्लॉक राष्ट्रों में से तमाम ने 1 मई को राष्ट्रीय अवकाश के रूप में अपना लिया। 

हिंदुस्तान में मई दिवस पहली बार 1 मई 1923 को मनाया गया, जब लेबर किसान पार्टी ऑफ़ हिंदुस्तान ने इसकी शुरुआत की और कॉमरेड सिंगारवेलर (सिंगारवेलु चेट्टियार) ने इस समारोह को आयोजित किया। दो सभाओं, ट्रिप्लिकेन बीच पर और दूसरा मद्रास हाईकोर्ट के सामने स्थित समुद्र तट पर जुटे तमाम मजदूर नेताओं और कामरेड की मौजूदगी में यह मांग की गई कि मजदूर दिवस को राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया जाना चाहिए।

वर्ष 1919 में प्रथम विश्व युद्ध के बाद वर्साय की संधि के हिस्से के रूप में एक अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन का गठन किया गया।  इस संगठन के गठन विश्वास को प्रतिबिंबित करने के लिए किया गया कि सार्वभौमिक और स्थायी शांति केवल तभी पूरी हो सकती है जब यह सामाजिक न्याय पर आधारित हो। 1946 में, अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष एजेंसी बन गई।

मई दिवस की पूर्व संध्या पर अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन के महानिदेशक गाइ राइडर ने एक वक्तव्य जारी कर Covid-19 काल में श्रमिकों की समस्याओं पर चिंता व्यक्त की।

पढ़ें, उन्होंने क्या कहा -

"इस वर्ष हम फिर से COVID-19 महामारी की छाया में, मई दिवस, अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस मना रहे हैं।

महामारी ने श्रम की दुनिया को तबाह कर दिया है, नौकरियों, उद्यमों और आजीविका को नष्ट कर दिया है, लाखों लोगों को गरीबी और वैश्विक विकास में बहुत पीछे धकेल दिया है।

और अधिकांश संकटों की तरह, इसने भी यह सबसे कमजोर और सबसे असहाय, सबसे कठिन, एक असमान दुनिया को और अधिक असमान बनाया है।

महामारी और इसके परिणाम वैश्विक अंतरनिर्भरता की चेन की याद दिलाते हैं।

यह स्वास्थ्य पर उतना ही लागू होता है जितना हमारे कामकाजी जीवन पर।

जब तक हर कोई सुरक्षित नहीं है तब तक कोई भी सुरक्षित नहीं है।

हम जिस अंतर-निर्भर दुनिया का निर्माण कर रहे हैं उसकी कोमलता  के सामने कोई भी दूसरों की स्थिति के प्रति उदासीन होने का जोखिम नहीं उठा सकता है।

'एकजुटता' ही सीमाओं और सीमाओं के भीतर हमारे सामान्य अस्तित्व और समृद्धि की कुंजी है।

जैसा कि हम आज के संकट से निपट रहे हैं और भविष्य की तरफ देख रहे हैं, एक बात स्पष्ट है: हमें न्याय और समानता के साथ एक मानव-केंद्रित सुधार की आवश्यकता है, ऐसी रिकवरी जो सभी के लिए टिकाऊ और समावेशी हो।

बेहतर निर्माण का अर्थ है विमर्श कर और सुसंगत नीति विकल्प बनाना:

  • नौकरियों को उत्पन्न करने और हर किसी के लिए एक छोटी, सभ्य काम करने की स्थिति बनाने के लिए;
  • सामाजिक सुरक्षा का विस्तार करने के लिए;
  • श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए; तथा
  • सामाजिक संवाद का उपयोग करने के लिए।

और इस मई दिवस पर, हम उन ऐतिहासिक संघर्षों को याद करते हैं, जो कड़ी मेहनत से हासिल किए गए।

आज, फिर से, काम की दुनिया में लोगों द्वारा COVID -19 को हराने के लिए असाधारण बलिदान किए जा रहे हैं।

हम उन्हें सलाम करते हैं, जैसे हम उन लोगों का शोक करते हैं, जिन्होंने अपना जीवन खो दिया है, लेकिन, हमें कभी भी सामाजिक न्याय के अपने मूल्यों का बलिदान नहीं करना चाहिए, न ही काम पर हमारे मौलिक अधिकार, और न ही बेहतर भविष्य के निर्माण के लिए हमारा दृढ़ संकल्प, ये वही अर्थ और उद्देश्य है जिन्होंने हमें इतने वर्षों से दुनिया भर में मई दिवस मनाने का अवसर दिया।

कई मायनों में, महामारी ने हमारे जीवन को अंधकार दे भर दिया है और उस कार्य को और अधिक कठिन बना दिया है।

फिर भी, यह नई संभावनाएं भी लाई हैं जिन्हें हम आगे बढ़ा सकते हैं।

संकट हमें पुनर्विचार करने का मौका देते हैं, यह लोगों के लिए, अपने ग्रह के लिए और समृद्धि के लिए नई पसंद और नई प्रतिबद्धताओं का निर्माण करता है।

इस अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर, ILO  श्रमिकों, नियोक्ताओं, सरकारों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से आह्वान करता है, हर कोई बेहतर निर्माण करने के लिए, सेनाओं में शामिल होने, सभी के लिए न्याय और सम्मान इस कार्य संसार में लाने के लिए प्रतिबद्ध हो।''