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क्या हुआ था उस दिन जब तमाम जद्दोजहद के बीच नहीं बचाया जा सका पत्रकार राजू मिश्रा को?

Public Lokpal
April 29, 2021

क्या हुआ था उस दिन जब तमाम जद्दोजहद के बीच नहीं बचाया जा सका पत्रकार राजू मिश्रा को?


क्या हुआ था उस दिन और रात, जब पत्रकार साथी राजू मिश्रा की जान बचाने के लिए कर रहे थे भरसक कोशिश लेकिन हुए नाकाम, जानें न्यूज़1 इंडिया के प्रधान संपादक अनुराग चड्ढा की ज़ुबानी- 

''सोमवार का दिन था दोपहर के वक़्त एक फ़ोन आया। घबराई हुई सी एक आवाज़ थी उस बच्ची की कहा अंकल मेरे पापा की तबियत बहुत ख़राब है। उनसे साँस नहीं ली जा रही है , ऑक्सीज़न लेवल गिरता जा रहा है। मैंने पूछा कौन हो बेटी  तुम, उसने कहा कि अंकल मैं राजू मिश्रा की बेटी हूँ। मैंने कहा बेटा चिंता मत करो कुछ प्रयास करता हूँ। इससे पहले मेरे पास दैनिक हिंट अख़बार के सीनियर फोटो जर्नलिस्ट पप्पू नेहरा का फोन आ चुका था। मैंने उस वक़्त भी राजू मिश्रा को अस्पताल में भर्ती कराने का प्रयास किया लेकिन प्रयास असफल रहा। लेकिन जब उसकी बेटी शिवानी का फोन आया तो मैं परेशान हो गया।

मैंने तत्काल गाज़ियाबाद के डीएम और कमिश्नर को फोन किया और बाक़ायदा उनको मैसेज किया, लेकिन हाथ उनके भी बंधे हुए थे। राजू मिश्रा को आईसीयू बेड वेंटीलेटर के साथ चाहिए था। बहुत प्रयास किये डीएम और कमिश्नर ने लेकिन वह भी सफल नहीं हो सके।

या यूँ कह सकते हैं कि ऐसा सिस्टम ही गाज़ियाबाद में अभी तक नहीं बना था कि किसी की जान को बचाने का प्रयास सफल हो जाए। एक आदमी मौत के मुंह में जा रहा था और हम लोग प्रयास कर रहे थे और उसमें सफल नहीं हो पा रहे थे यह सिस्टम की कमजोरी थी जो मेरी भी समझ में आ रही थी। पूरी रात राजू जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहा था और उसकी मासूम बेटी शिवानी मुझे पूरा हाल बता रही थीं। मैं भी सिहर उठा लेकिन लाचार था, इस सिस्टम के आगे। इतना असहज मैंने अपने आप को कभी नहीं देखा। ग़लतफहमी दूर हो रही थी मेरी भी। अफसरों से अच्छे संबंधों वाली कि समय आने पर यह लोग हमारे काम आएंगे। खैर रात बीत गई एक नई सुबह नई उम्मीद के साथ मैंने बड़ी हिम्मत करके पहले उसकी बेटी शिवानी को फोन किया। उसने कहा अंकल वही हालात है मैंने उसे हिम्मत दी।

शहर भर में अस्पतालों में एक अदद आईसीयू बेड मुझे नहीं मिला। मैंने शिवानी को इंतज़ार करने के लिए कहा, लेकिन राजू मिश्रा की उखड़ती सांसें शिवानी को इंतज़ार नहीं करने दे रही थी। उसके पास किसी का फ़ोन आया कहा शिवम् अस्पताल में ही राजू को भर्ती करा दो, बेटी को उम्मीद जागी और वह शिवम् अस्पताल चली गई जहाँ राजू मिश्रा भर्ती हो गए। वह भी काफी आश्वस्त दिखाई दे रही थी और काफी हद तक मैं भी कि सरकारी अस्पताल से अच्छा इलाज उसे शिवम् अस्पताल में मिलना शुरू हो गया। रात के 3:00 बजे थे फोन बजा नींद खुली तो देखा कि पत्रकार मिश्रा की बेटी शिवानी फोन कर रही है। मन आशंका से ग्रस्त हो गया। फ़ोन उठाने से पहले उँगलियाँ कांपने लगी जैसे-तैसे फोन उठाया तो मुंह से आवाज नहीं निकली लेकिन दूसरी तरफ से जो आवाज आ रही थी वह ह्रदय को कंपकंपाने वाली थी। बेटी कह रही थी कि अंकल पापा को बचा लो।

अब मैं उस बच्ची को क्या बोलता कि जो सिस्टम दिन में हमारी पुकार नहीं सुन रहा वह रात के 3:00 बजे क्या सुनेगा। खैर कोशिशें की लेकिन नाकामयाब रही। सुबह के साथ बच्चों के साथ वरिष्ठ पत्रकार संतराज ठाकुर का फ़ोन आया कहा भैया कैसे भी करके भर्ती कराओ जब गाज़ियाबाद से मैंने उम्मीदें छोड़ दी तो नोएडा कमिश्नर आलोक सिंह को फोन किया। उन्हें संबंधों की दुहाई देते हुए कहा कि राजू मिश्रा को कैसे भी करके बचा लीजिये। उन्होंने मामले की गंभीरता को समझते हुए राजू मिश्रा की डिटेल ली और उन्होंने दो एसीपी स्तर के अधिकारियों की ड्यूटी लगा दी, लगातार शिवानी का फोन आ गया कि अंकल रहने दीजिये सब खत्म हो गया। आप यकीन मानिये कि उन शब्दों ने मानो शरीर में खून के प्रभाव को रोक दिया हो। मैं खुद अपने आप को हारा हुआ महसूस कर रहा था।

फिर अस्पताल की हठधर्मिता शुरू हुई। उस बच्ची के पास देने को पैसे नहीं थे। खैर हिंट अख़बार के चेयरमैन कपिल त्यागी और मैंने चीज़ें मैनेज की फिर हम दोनों ने एक नया टास्क लिया कि शिवानी के पिता को तो हम लोग बचा नहीं पाए लेकिन उसकी मां को जरूर बचाएंगे। फिर हम दोनों ने यशोदा अस्पताल के प्रबंधन तंत्र को इस बारे में अवगत कराया। उन्होंने युद्ध स्तर पर शिवानी की मां को शिवम् अस्पताल से यशोदा भर्ती कराया। फिर उस बच्ची से बात हुई बार - बार वह कह रही हैं कि अंकल मां को मैंने कुछ नहीं बताया कि पापा कहाँ चले गए लेकिन अब आप लोग मिलकर मां को बचा लो।

''तुम्हारी सुर्ख़ियों से अख़बार भरता था आज तुम्हारी लापरवाही ने मुझे ही हैडलाइन बना दिया.... जा रहा हूँ लौट के फिर नहीं आऊंगा'' 

पत्रकारिता में बीट मिलती है सभी पत्रकारों को ऐसी ही बीट राजू मिश्रा के हेल्थ के रूप में मिली हुई थी और पत्रकार की उसकी बीट पर अच्छी पकड़ होती है हम लोग समाज में रहते हैं अक्सर हमें किसी न किसी की सिफारिश करनी पड़ती है तो हम लोग बीट पत्रकार से ही कहते हैं कि भाई फलाना क्राइम रिपोर्टर है, जीडीए में इसकी पकड़ है प्रशासन में तो इसका जवाब नहीं वैसा ही राजू मिश्रा के बारे में कहा जाता था कि हेल्थ में उसके जैसा कोई धुरंधर कोई नहीं अपनी पत्रकारिता के दौरान उसने चिकित्सा विभाग के कई अधिकारियों का सहयोग किया मानवता के नाते नहीं। नहीं तो उनकी नौकरियों चली जाती लेकिन किसी ने भी राजू मिश्रा के कर्ज को नहीं चुकाया वह नाकारा लोग भूल गए कि यह वही हेल्थ बीट का रिपोर्टर है उनके लिए छोटे-छोटे काम की सुर्खियां बनाकर उन्हें हीरो बनाता है हेड लाइन में उनका नाम डालता है लेकिन वह बेदर्द डॉक्टर उसके अंत समय में काम नहीं आये, नकारेपन की हालत यह तो यह थी कि जब उनको मालूम था लंग्स में इन्फेक्शन है तो न तो उन्होंने सीटी स्कैन कराया और न ही ब्लड टेस्ट कोरोना इन्फेक्टेड व्यक्ति को होते हैं वह उन्होंने नहीं कराए। बस ऑक्सीजन का मास्क मुंह पर लगा दिया और अपनी ड्यूटी पूरी कर ली अगर अपनी डॉक्टरी ही उन लोगों ने अच्छी तरीके से की हो तो शायद आज कलम के सिपाही की जुबान बंद न होती।

यह श्रद्धांजलि बता रही है कि उत्तर प्रदेश का हेल्थ सिस्टम इतना धराशायी हो गया है कि इसकी ख़बर जनता तक लाने वाला रिपोर्टर भी आज ख़बर बनकर रह गया।  

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